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Special: देश नेहरू-अटल की 'राजनीति' से आगे बढ़ेगा या मोदी-राहुल की 'सियासत' से

khaskhabar.com : बुधवार, 31 जनवरी 2018 6:47 PM (IST)
Special: देश नेहरू-अटल की 'राजनीति' से आगे बढ़ेगा या मोदी-राहुल की 'सियासत' से
Manoj Kumar Sharma
भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश माना जाता है। इस देश को यह गौरव दिलवाया इसकी मिट्टी में पैदा हुए महान लोगों ने, जिन्होंने विकट से विकट परिस्थितियों में राजनीति मूल्यों को न केवल संजोकर रखा। एक समय ऐसा था जब सरकारें विपक्ष की आवाज को सुनती भी थी और अमल भी करती थी, और जहां बात देशहित की होती सभी दल मजबूती से सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े दिखाई देते थे।

लेकिन हाल ही के वर्षों में देश के राजनीतिक हालातों को देखकर आम भारतीय की तरह ही मेरे मन में भी निराशा का भाव पनपता है। आज सत्ता पक्ष स्वघोषित भगवान बन चुका है तो विपक्ष भी किसी उद्दंड राक्षस के समान अपने हितों के लिए ही आक्रामकता दिखाता है। वर्तमान राजनीति में हर चीज राजनीतिक लाभ के इर्द गिर्द सिमटकर रह गई है।

इस मुद्दे की शुरुआत मंगलवार को एक मुस्लिम नेता के बयान से करना चाहूंगा। मुस्लिम पर्सनल बोर्ड के उपाध्यक्ष मुफ्ती नासिर उल इस्लाम ने मंगलवार को एक ऐसा बयान दिया जो देश के संविधान, प्रत्येक पार्टी, प्रत्येक नेता, प्रत्येक भारतीय नागरिक के मुंह तमाचे के समान है। इस्लाम ने कहा कि हिंदुस्तान में रहने वाले मुसलमानों को दूसरा पाकिस्तान बनाने के बारे में सोचना चाहिए।

दुर्भाग्य है कि देश में इन दिनों मुद्दों की नहीं बल्कि राजनीतिक लाभ की राजनीति हो रही है। छोटे-छोटे मुद्दों पर एक-दूसरे के खिलाफ छींटाकशी करने वाले राजनेता देश की अस्मिता से खिलवाड़ करने वाले इस बयान पर चुप्पी साध गए। इस बयान के मायने उतने ही गंभीर हो जाते हैं कि आपका विरोधी देश आपको युद्ध की धमकी दे और उसके जवाब में मौन रह जाएं।

ये तो एक बात रही। विविधताओं से ओतप्रोत हमारे देश में इन दिनों कई ऐसी चीजें देखने को मिल रही है जो देश को शर्मसार कर रही है। पांच दिन पूर्व ही गणतंत्र दिवस के मौके पर एक दृश्य देखने को मिला जिसने भारतीय राजनीति के गिरते स्तर की खुलेआम नुमाइश कर दी।

गणतंत्र दिवस समारोह में एक ओर मोदी सरकार ने दस आसियान देशों के प्रमुखों को विशेष आदर सत्कार देते हुए अतिथि के तौर पर बुलाया। वहीं दूसरी ओर देश की 125 साल पुरानी पार्टी कांग्रेस के मुखिया राहुल गांधी को उन्होंने छठवीं पंक्ति में बिठाकर पूरे देश के सामने शर्मसार कर दिया।

वर्तमान सरकार शायद यह भूल गई कि कभी कांग्रेस पार्टी भी सत्ता में रह चुकी होगी और शायद सत्ताधारी दल के कई महान राजनेता इस गणना से भी अनजान है कि राहुल जिस दिन गांधी परिवार में पैदा हुए थे उसी दिन उन्होंने इस देश के प्रधानमंत्री बनने का लाइसेंस हासिल कर लिया था। ये बात पढ़ने में आपको भले ही अजीब लगी हो लेकिन ये आप भी जानते हैं और मैं भी। देर सवेर जब कभी कांग्रेस सरकार सत्ता में वापसी करेगी प्रधानमंत्री राहुल गांधी ही बनेंगे।

खैर ये तो रही सत्ता पक्ष की गैरजिम्मेदाराना रवैए की बात। दूसरी ओर विपक्ष भी इस मामले में किसी लिहाज से सत्ता पक्ष से कम नहीं है। एक माह पहले की ही बात है जब राहुल गांधी विदेश दौरे पर थे तो वहां भारत सरकार जमकर कोस रहे थे।

राहुल ऐसा करके सिर्फ देश को शर्मसार करने का काम कर रहे थे। अगर वे सरकार की किसी बात से नाराज भी थे तो देश में रहते हुए भी अपनी बात उठा सकते थे। अब राहुल गांधी को कौन समझाए कि उनका वोट बैंक भारत में है ना कि बहरीन में।

एक दूसरा वाक्या डोकलाम विवाद के दौरान का है। जब भारतीय सेना चीनी सेना के सामने डटकर चुनौती देते हुए अपने कौशल और निडरता का परिचय दे रही थी, ठिक उसी वक्त राहुल गांधी चीनी राजदूत से मिलकर मन की बात कर रहे थे।

जब देश में बवाल मचा तो राहुल की तरफ से सफाई पेश की गई कि वह सीमा विवाद पर चीनी राजदूत से जानकारी ले रहे थे। इसे राहुल गांधी की अपरिपक्वता कहा जाए या राजनीतिक शून्यता। एक ओर चीन भारत को युद्ध की धमकी दे रहा था और दूसरी ओर वे देश के दुश्मनों के साथ दोस्ती बढ़ा रहे थे।

विवाद और राहुल गांधी का नाता यहीं खत्म नहीं हो जाता। हाल ही में जब सुप्रीम कोर्ट के जजों की आपसी कलह खुलकर देश के सामने आई तो राहुल गांधी इस विवाद में भी अपना राजनीतिक फायदा उठाने का प्रयास किया। हालांकि उन्हें इस विवाद से कुछ हासिल तो नहीं हुआ लेकिन वे अपनी राजनीतिक अपरिपक्वता एक बार फिर देश के सामने जाहिर कर बैठे।

बात किसी दल या किसी नेता को सुधारने की नहीं भारतीय राजनीति के मूल्यों की रक्षा करने की है। राजनेताओं को यह समझना होगा कि देश को ऐसी ओछी राजनीति से कोई लाभ नहीं होने वाला।

आज देश को उस राजनीतिक सम्बन्धों और उदाहरणों से सीख लेने की आवश्यकता है जब पंडित जवाहर लाल नेहरू देश में आने वाले विदेशी मेहमानों को विपक्षी युवा नेता अटल बिहारी वाजपेयी से यह कहकर मिलवाते थे कि ये हमारे देश के प्रतिभाशाली नेता हैं और मुझे पूरा यकीन है कि ये एक देश का प्रतिनिधित्व करेंगे।

आज राजनीतिक पार्टियां इन नेताओं को सियासी फायदे के लिए याद तो करती है लेकिन इनके जीवन मूल्यों से कोई सीखी नहीं लेती।



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