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लोकसभा चुनाव 2019 : क्या उत्तरप्रदेश फिर तय करेगा देश की राजनीतिक दिशा?

khaskhabar.com : मंगलवार, 21 मई 2019 6:03 PM (IST)
लोकसभा चुनाव 2019 : क्या उत्तरप्रदेश फिर तय करेगा देश की राजनीतिक दिशा?
1989 के चुनाव में जनता दल ने उत्तरप्रदेश की 54 सीटों पर जीत दर्ज की, लेकिन केंद्र में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। कांग्रेस ने 197, जनता दल ने 143, जबकि भाजपा ने 85 सीटों पर जीत हासिल की थी। जनता दल ने भाजपा और वाम दलों के समर्थन से राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार बनाई। विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बने थे। 1991 के आम चुनाव ने उत्तरप्रदेश के देश का राजनीतिक भाग्य तय करने की परंपरा तोड़ दी।

भाजपा को 51, जनता दल को 22 और कांग्रेस को केवल पांच सीटें मिलीं। पहली बार ऐसा हुआ कि उत्तरप्रदेश से इतनी कम सीटें जीतने के बावजूद कांग्रेस 232 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और गठबंधन सरकार बनाई। पी.वी. नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री बने थे। 1996 और 1999 में, भाजपा ने उत्तरप्रदेश में क्रमश: 52 और 59 सीटें जीती और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में गठबंधन सरकार का गठन हुआ था।

1999 में चुनाव कारगिल युद्ध के बाद हुआ था। भाजपा 182 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, जबकि कांग्रेस को केवल 114 सीटें मिलीं। यह पहली बार था, जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एक गैर कांग्रेसी गठगंधन सरकार ने पांच वर्ष के कार्यकाल को पूरा किया। 1991 के बाद यह दूसरी बार हुआ जब उत्तरप्रदेश में सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी (भाजपा) केंद्र में सरकार नहीं बना सकी।

1999 में सपा को 35, भाजपा को 29 और कांग्रेस को केवल 10 सीटें मिली थीं। 2004 में, कांग्रेस ने उत्तप्रदेश में केवल आठ सीटों पर कब्जा जमाया, जबकि सपा को सबसे ज्यादा 35 सीट मिलीं। इसके बावजूद भी कांग्रेस नीत संप्रग ने सरकार बनाई। 2009 में यहां सपा और कांग्रेस ने 22-22 सीटों तो बसपा ने 20 और भाजपा ने 10 सीटों पर कब्जा जमाया।

कांग्रेस ने फिर से मनमोहन सिंह के नेतृत्व में सरकार बनाई। 2014 के आम चुनाव में उत्तरप्रदेश ने एक बार फिर खुद को देश की राजनीति की दशा तय करने वाले राज्य के रूप में स्थापित किया। भाजपा ने यहां 73 सीटों पर कब्जा जमाया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनाई।

(IANS)

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